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जरावग्गो / धम्मपद / पालि

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१४६.
को नु हासो किमानन्दो, निच्‍चं पज्‍जलिते सति।
अन्धकारेन ओनद्धा, पदीपं न गवेसथ॥

१४७.
पस्स चित्तकतं बिम्बं, अरुकायं समुस्सितं।
आतुरं बहुसङ्कप्पं, यस्स नत्थि धुवं ठिति॥

१४८.
परिजिण्णमिदं रूपं, रोगनीळं पभङ्गुरं।
भिज्‍जति पूतिसन्देहो, मरणन्तञ्हि जीवितं॥

१४९.
यानिमानि अपत्थानि , अलाबूनेव सारदे।
कापोतकानि अट्ठीनि, तानि दिस्वान का रति॥

१५०.
अट्ठीनं नगरं कतं, मंसलोहितलेपनं।
यत्थ जरा च मच्‍चु च, मानो मक्खो च ओहितो॥

१५१.
जीरन्ति वे राजरथा सुचित्ता, अथो सरीरम्पि जरं उपेति।
सतञ्‍च धम्मो न जरं उपेति, सन्तो हवे सब्भि पवेदयन्ति॥

१५२.
अप्पस्सुतायं पुरिसो, बलिबद्धोव जीरति।
मंसानि तस्स वड्ढन्ति, पञ्‍ञा तस्स न वड्ढति॥

१५३.
अनेकजातिसंसारं , सन्धाविस्सं अनिब्बिसं।
गहकारं गवेसन्तो, दुक्खा जाति पुनप्पुनं॥

१५४.
गहकारक दिट्ठोसि, पुन गेहं न काहसि।
सब्बा ते फासुका भग्गा, गहकूटं विसङ्खतं।
विसङ्खारगतं चित्तं, तण्हानं खयमज्झगा॥

१५५.
अचरित्वा ब्रह्मचरियं, अलद्धा योब्बने धनं।
जिण्णकोञ्‍चाव झायन्ति, खीणमच्छेव पल्‍लले॥

१५६.
अचरित्वा ब्रह्मचरियं, अलद्धा योब्बने धनं।
सेन्ति चापातिखीणाव, पुराणानि अनुत्थुनं॥

जरावग्गो एकादसमो निट्ठितो।