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शकुन्तला / अध्याय 12 / भाग 2 / दामोदर लालदास

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गीदड़, गीध, कुकुर सभ खिचि-खिचि लाशक मांस चिबौतौ।
बहुत माछकें तहूँ चिबौलें! चिबा हाड़ कटकौतौ।।
धरनी, बाल-बचो सभ कतबो कानि-कुहरि गोहरौतौ।
ब्रह्मो आइ बचा नहि सकथुन, दोसर के बचबौतौ?’

‘स-स-सरकार! दया करु अपने, एहि गरीबकेर ऊपर।
द-द या-द द या द या करु हे बदनसीबकेर ऊपर।।
भ-भ-भ गवानक घर अपनें धरम दयाक लिखायत।
द-द-या नहि करइब अपने तँ ई गरीब मरि जायत।
बाल-बचा घरनी-घर सभटा हमर बिलटिये जयतै।
लेध-गेध छइ जाल न धरतइ, तखन कोना की खयतै?
बिना कमयने एहि गरीबकें, के देत पा भरि दाना?
द-द या करु हमरा पर मालिक! छइ नहि नीक जमाना।।’

‘चल, चल, चोर! छाँठ जनि बेशी शास्त्र-पुराणक वाणी।
हमर काज चोरे पकड़क अछि, छोड़ने जीवन हानी।।
छोड़थुन, जहल देखौथुन राजा, की लटकौथुन फाँसी।
हुनकहि सभ अधिकार दण्ड देबक वा छोड़क खासी।।’

अस्तु, डँटति, डपटति, मुकिअबइत आनल चोर पकडि़कें।
कर लय रत्न-मुद्रिका पहुँचल नृपक समीप ससरिकें।।
‘सरकारी-नामांकित औंठी चोर एक पकड़ायल।
लेल जाओ सरकार हुकुम हो, बाहर चोर बन्हायल।।’

शापान्तिकी विलोकि मुद्रिका नृपक हाल किछु आने।
मन किछु आन, नयन किछु आने-बोल चाल किछु आने।।
आने प्रीति-रीति आने किछु शान-मान किछु आने।
शासन-नीति आइ किछु आने ज्ञान-ध्यान किछु आने।।

एक दिशि यथा रविक अरुणाभा, एक दिशि डुबइत चन्दा।
सैह मनस्थिति वसुधाधीशक देखि मुद्रिका मन्दा।।
एक दिशि कमलक मधुर हास कुमुदिनिक एकदिशि जहिना।
हँसी-खुशी सभ बन्द शोकसँ नृपक परिस्थिति तहिना।।

त्वरित कटल मुक्तिक परमाना-‘एहि व्यक्तिकें छोड़ह।
एकर कथन सभटा सत्ये अछि! बन्धन तोड़ह-तोड़ह।।’
मणि-मुद्रीक मूल्य दय सादर मलहा छोडल गेले।
बाजल पुलिस ‘जाह घर धीमर! भाग्य उदित तोर भेले।।

फाँसी चढ़क परिस्थितिसँ नृप गजरथ मानु चढ़ौलनि।
भाग्योदय एहिसँ बढि़ की हो! मानो बेश बढौलनि।।
चलह आब कनि मधुशाला दिशि महा मूल्य तों पौलह।
करी आइ मधुपान सबहुँ मिलि हमरो हर्ष बढ़ोलह।।’

आनन्दक लहरीक बीच सभ मधुशालामे पिबइत।
अपन भाग्य चरचा करैत महिपक जयकार मनबइत।।
कर्णांगुलि दय हर्षित कमला-गीत-नाद कति गबइत।
पुलिस-सिपाही सभसँ पुनि-पुनि धन्यवाद जय पबइत।।

मलहा परम प्रसन्न गेल घर घरनी लग बेसौलक।
बितल मुद्रिका-हाल अपन दुर्गतिहुँक कथा सुनौलक।।
धन्यवाद राजाक दैत कत जय जयकार मनौलक।
खों इछाभरि उझलैत द्रव्य घरनी धरिके हर्षोलक।।