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शकुन्तला / अध्याय 4 / भाग 2 / दामोदर लालदास

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अभिनय उन्नतशील मनोहर पुष्ट पयोधर भारें।
नव नागरिक भेल की अनुपम मन्द-चरण-सँचारें।।
कंचुकिमे कुच जानि कसल अति कहि कहि हास्यक बोली।
हंसि-हंसि करथि नित्य सखि तनिकर ढ़ील सुबक्कल चोली।।

यौवन भरल निहारथि नव तन अपन जखन सुकुमारी।
एक अपूर्वानन्द भरलि से मुसुकि उठेछलि भारी।।
से रहस्य यदि सखि क्यौ देखथि-कहथि समेत प्रमोदे-
‘नव धन-रत्न पाबि ककरा नहि हो सखि! मधुर विनोदे?’

अस्तु, देखि कन्याक वयस-परिणत, तारुण्य-विकासे।
पिता कण्वकें तनिक विवाहक बढ़़ल प्रबल अभिलाषे।।
अनुखन रहथि महा चिन्तापुर बाजथि मनक व्यथामे-
‘कल्पलताक योग्य पृथिवीपर पारिजात कोन ठामे!’

से विवाह-चर्चा यदि कौखन सुखद विनोदकारी।
सखिगण शकुन्तलाक निकटमे करथि रहस्य विचारी।।
तखन-तखन सँकोच-विवस भय सहित मधुर मुसुकाने-
रहि जाइत छलि भेलि अधोमुखि से सुन्दरि, सखि-प्राणे।।

कौखन देखि मौन कहुँ बैसलि सखिगण आबि सचूपे।
श्रवण-निकट मुख आनि कहैछलि वचन समय-अनुरूपे-
‘आब थोड़ दिन रहल, धैर्य धर, चिन्तें नहि किछु पैबें।
शीघ्रे आब सखी! सुयोग्य वर-सँग अपन घर जैबें।।

सुनि, हाँसि जखन बजैछलि सुन्दरि-‘हँट नहि नीक लगैये।’
तखन तकर उत्तरमे सखि हँसि सुनु की व्यंग करैये!
‘लागत आब नीक तोरा सखि! कोना साँच, मम बैना!
तजि नव पुरुषक बचन, गड़ल छह जनिका ऊपर नैना।।’

जे सुनि विहँसि मोरि मुख-मण्डल बाजथि वीण लजौने।
उत्तर हमर कथाक रहै अछि सखी बेश सरियौने।।
अस्तु, एतादृश होय परस्पर हास्य सरस सविनोदे।
फलतः सबहुँ रहैछलि हिलि-मिलि भरलि अपूर्व प्रमोदे।।