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शरशय्या / पहिल सर्ग / भाग 10 / बुद्धिधारी सिंह 'रमाकर'

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किन्तु एक सन्देह बनल अछि
कहब धखाए सुनब नरपाल।
सन्तति प्रौढ़ अहँक यदि ठानए
समर तखन की होएत ताल”?।।48।।

जानि अथ श्रीमान् कहल पुनि,
“करिए प्रतिज्ञा दिव्य प्रमाण।
श्वेत अस्त्र जननीक धार सम
साक्षी छूबि कहिए परिणाम।।49।।

हम नहि करब विवाह जन्म भरि
राखि धर्म हरिपद भए लीन।
क्षत्रियवंशक गौरव राखब
सूनथु गुणगण अधिपतितीन”।।50।।

आनि सपत्निमाए ओ अर्पल
पिता परखि सुत सूँघल माथ।
कहल “रहत इच्छापर निर्भर
मृत्यु अहँक वश प्राणकनाथ।।51।।

देवब्रत! अछि भीषण व्रत ई
भीष्म अहँक ते धारी नाम।
यावत् सूर्यसुधाकर नभमे
जीवित रहब अहाँ गुणधाम”।।52।।