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हौरैं-हौंरैं डोलतीं सुगंध-सनीं डारन तैं / शृंगार-लतिका / द्विज

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रूप घनाक्षरी
(चित्त स्थिर होने पर वसंत-शोभा का अनुभव करते हुए वर्णन)

हौंरैं-हौंरैं डोलतीं सुगंध-सनीं डारन तैं, औंरैं-औरैं फूलन पैं दुगुन फबी है फाब ।
चौंथते चकोरन सौं, भूले भए भौंरन सौं, चारयौ ओर चंपन पैं चौगुनौं चढ़ौ है आब ॥
’द्विजदेव’ की सौं दुति देखत भुलानौं चित, दसगुनी दीपति सौं गहब गछै गुलाब ।
सौगुने समीर ह्वै सहसगुने तीर भए, लाखगुनी चाँदनी, करोरगुनौं महताब ॥५॥